‘आप चाहे डाॅक्टर बनो, चाहे इंजीनियर बनो अथवा अध्यापक -परन्तु सबसे पहले अच्छा इन्सान बनो : SHANTA KUMAR

‘‘कामयाबी के सफर में धूप बड़ी काम आई, छांव अगर होती तो कब के सो गए होते।’’ स्वामी विवेकानन्द जी को अपना आदर्श मानने वाले माननीय श्री शान्ता कुमार जी ने स्वामी जी की विचारधारा, उनके जीवन की सशक्त उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया

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अस्तित्व ओजमयी स्वामी का

 

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‘चाहे आप डाक्टर बनो, चाहे इंजीनियर बनो या अध्यापक -परन्तु सबसे पहले अच्छे इन्सान बनो। आज लोग मंच पर खड़े होकर बड़े-बड़े भाषण देते हैं लेकिन मूल रूप से ज़िन्दगी में उसे चरितार्थ नहीं करते, ” यह उद्गार हैं आदरणीय श्री शान्ता कुमार जी के जो उन्होंने 12 जनवरी को कायाकल्प के योग भवन में स्वामी विवेकानंद महोत्सव समारोह के उपलक्ष्य में आयोजित किया। राज्य स्तरीय भाषण प्रतियोगिता के पारितोषिक वितरण कार्यक्रम में प्रकट किए गए। उन्होंने युवाओं को जागरूक करते हुए अच्छा इन्सान बनने पर बल दिया क्योंकि किसी भी देश की युवा ऊर्जा देश का स्वाभिमान होता है। युवा ऊर्जा जब सकारात्मकता की ओर कार्य करती है तो वह राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है अन्यथा नकारात्मक ऊर्जा राष्ट्र को भीतर ही खोखला कर देती है।

अतः युवा शक्ति को अपना हर क़दम बड़ी सोच-समझ से आगे बढ़ाना है। प्रत्येक सकारात्मक निर्देश राष्ट्र के परचम को गौरवमयी करेगा और एक अच्छा इन्सान ही युग-प्रवर्तक कहलाता है। जीवन तो हर कोई जीता है लेकिन जीवन की निष्पक्षता अच्छाई में ही समाहित है। व्यक्ति इतना भी उच्च ऋषिक्षा क्यों न ग्रहण कर ले, जीवन मंे स्वयं के लिए बहुत भी भौतिक प्रगति क्यों न कर ले लेकिन वास्तविक अर्थों में मनुष्य वही है जो अपने वर्चस्व से समाज को उन्नति के शिखर की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करे।
जो दूसरों की अनुभूतियों को स्वयं अनुभव करते हैं, उनके दुःख को समझने में संभव है। यह सब चरितार्थ कर दिखाया स्वामी विवेकानंद जी ने जो हम सब भारतीयों के आर्षष हैं, युग प्रवर्तक हैं जिनके ओजस्वी शब्दों के ‘भाईयो और बहनों’ के सम्बोधन ने सभी जगत को एक परिवार के सूत्र में सम्मिलित कर लिया। उनके भगवा वस्त्रों ने सन्यासी होकर भी विश्व को ‘वसुधैव कुतुम्बकम’ के चमत्कारिक सनातन मूलमन्त्र से बांध दिया। उन्होंने सन्यासी रूप में देश सेवा में समर्पित कर दिया। उनके भगवा वस्त्र माता भारती के गौरवमयी सुपुत्र होने के परिचायक हैं जो सर्वत्र को भारत के सनातन मूल्यों से अवगत करवाते हैं। सन्यासी बन कर वह जंगलों में नहीं गई।
हिमालय गो तपस्या नहीं की बल्कि राष्ट्र सेवा का कठोर धरातल उस समय को चुना जब हमारा युवा वर्ग लाॅर्ड मैकाले की शिक्षा नीतियों में उलझा मार्ग की तलाश कर रहा था। चलने योग्य अपने लिए धरा खोज रहा था। उस समय स्वामी जी ने अपने देश के युवा वर्ग के समक्ष जीवन के उद्देश्य का विस्तार किया। सनातन मूल्यों से अवगत करवाते हैं। सन्यासी बन कर वह जंगलों में नहीं गई। हिमालय जाने तपस्या नहीं की बल्कि राष्ट्र सेवा का कठोर धरातल उस समय को चुना जब हमारा युवा वर्ग लाॅर्ड मैकाले की शिक्षा नीतियों में उलझा मार्ग की तलाश कर रहा था। चलने योग्य अपने लिए धरा खोज रहा था।
उस समय स्वामी जी ने अपने देश के युवा वर्ग के समक्ष जीवन के उद्देश्य का विस्तार किया। सनातन मूल्यों से अवगत करवाते हैं। सन्यासी बन कर वह जंगलों में नहीं गई। हिमालय जाने तपस्या नहीं की बल्कि राष्ट्र सेवा का कठोर धरातल उस समय को चुना जब हमारा युवा वर्ग लाॅर्ड मैकाले की शिक्षा नीतियों में उलझा मार्ग की तलाश कर रहा था। चलने योग्य अपने लिए धरा खोज रहा था। उस समय स्वामी जी ने अपने देश के युवा वर्ग के समक्ष जीवन के उद्देश्य का विस्तार किया।

उठो, जागो और तब तक न रूको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो।’

12 जनवरी 1863 को जन्मी स्वामी विवेकानंद ने देश की युवा-शक्ति को जागृत किया, उनकी आह्वान किया, उन्हें एक उद्देश्य दिया और 11 सितंबर 1893 को शिकागो में एक सर्व-धर्म सम्मेलन में जहां विष्वभर के प्रतिनिधियों उपस्थित थे, वहां लेडीज़ और जैन्टलमैन ने के सम्बोधन को मूक करते हुए ‘भाईयो और बहनों’ के सम्बोधन ने सभी को मंत्रमुग्ध कर अपनेपन की एक नई अनुभूति से लबरेज कर दिया।
धन्य है वह वीर सन्यासी जिसने माँ भारत के गौरवान्वित आंचल को लहराने के लिए सम्भावनाओं के नए आसमान प्रदान किया, आँखों में नव स्वप्नों के नवरंग भर राष्ट्र की युवा-शक्ति को प्रेरित किया और दावा किया कि देश के मुठ्ठी भर युवा भी अगर उनके साथ हैं तो देश की प्रगति को रोकने का साहस कोई भी नहीं कर सकता। स्वामी जी की दूर दृष्टि व स्वस्थ दृष्टिकोण आज की परिस्थितियों में एक आदर्श के रूप में समाज में समाहित हैं और समाज के कण-कण में और भी प्रभावी ढंग से समाहित हो सकते हैं लेकिन आवश्यकता है प्रचार और प्रसार की और युवाशक्ति को संगठित कर उन्हें उनकी ऊर्जा के बारे में जागृत कर उन्हें सकारात्मक रचनात्मकता की ओर ले जाने की। यह कार्य आदरणीय श्री गौरत कुमार जी ने बखूबी किया।
राज्य में पहली बार उन्होंने युवा शक्ति को एक मंच पर एकत्रित कर स्वामी विवेकानंद जी के जीवन को प्रेरणा स्रोत बन कर 12 जनवरी को कायाकल्प के योग भवन में राष्ट्र के नव निर्माण में एक ऐतिहासिक मील पत्थर लगा कर राष्ट्र धरोहर बना दिया जो वास्तव में ही है। एक सराहनीय और प्रशंसनीय प्रयास है। युवाशक्ति को संगठित कर उन्हें उनकी ऊर्जा के बारे में जागृत कर उन्हें सकारात्मक रचनात्मकता की ओर ले जाने की। यह कार्य आदरणीय श्री गौरत कुमार जी ने बखूबी किया।
राज्य में पहली बार उन्होंने युवा शक्ति को एक मंच पर एकत्रित कर स्वामी विवेकानंद जी के जीवन को प्रेरणा स्रोत बन कर 12 जनवरी को कायाकल्प के योग भवन में राष्ट्र के नव निर्माण में एक ऐतिहासिक मील पत्थर लगा कर राष्ट्र धरोहर बना दिया जो वास्तव में ही है। एक सराहनीय और प्रशंसनीय प्रयास है। युवाशक्ति को संगठित कर उन्हें उनकी ऊर्जा के बारे में जागृत कर उन्हें सकारात्मक रचनात्मकता की ओर ले जाने की। यह कार्य आदरणीय श्री गौरत कुमार जी ने बखूबी किया।
राज्य में पहली बार उन्होंने युवा शक्ति को एक मंच पर एकत्रित कर स्वामी विवेकानंद जी के जीवन को प्रेरणा स्रोत बन कर 12 जनवरी को कायाकल्प के योग भवन में राष्ट्र के नव निर्माण में एक ऐतिहासिक मील पत्थर लगा कर राष्ट्र धरोहर बना दिया जो वास्तव में ही है। एक सराहनीय और प्रशंसनीय प्रयास है।
प्रथम बार विवेकानंद ट्रस्ट के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री, सांसद और पार्टी के वरिष्ठ नेता जो अब चुनाव लड़ेंगे नहीं बल्की युद्ध लड़ेंगे, परम् आदरणीय श्री शान्ता कुमार जी ने कायाकल्प और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संयुक्त तत्वाधान, स्वामी विवेकानंद जी के जन्मोत्सव पर स्वामी जी के साथ जीवन पर भाषण प्रतियोगिता का आयोजन राज्य स्तर पर करवाया।
आरम्भ से ही स्वामी विवेकानंद जी को अपना आदर्श मानने वाले माननीय श्री शान्ता कुमार जी ने स्वामी जी की विचारधारा, उनके जीवन की सशक्त उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया जिसमें स्वामी विवेकानंद जी के जीवन पर राज्य स्तरीय प्रतियोगिता का सफल आयोजन हुआ। एक महत्वपूर्ण आधार पत्थर है जिसमें एक हज़ार विद्यालयों और महाविद्यालयों के लगभग 30 हज़ार छात्रों ने भाग लिया।
लगभग अकिल महीने में पूरे राज्य में भाषण प्रतिस्पर्धाओं का आयोजन कर राज्य को स्वामी विवेकमयी कर दिया और अन्तिम प्रतिस्पर्धा 11 जनवरी 2020 को सम्पन्न हुई और 12 जनवरी 2020 को कायाकल्प के योग भवन में पारितोषिक वितरण समारोह का आयोजन हुआ। बकौल श्री शान्ता कुमार जी के प्रत्येक विद्यालय और महाविद्यालय में एक-एक अध्यापक को बच्चों को स्वामी विवेकानंद जी के जीवन पर भाषण तैयार करने के लिए तैनात किया जाएगा, कब से कितनी ही अध्यापकों ने स्वामी जी के जीवन के बारे में सुना होगा और पढ़ा होगा। होगा, न जाने कितने ही छात्र-छात्राओं ने स्वामी जी के जीवन पर विस्तृत अध्ययन किया है। लगभग दो लाख लोगों ने इन भाषणों को सुना। राज्य में कितने लोगों ने स्वामी विवेकानंद जी के जीवन से प्रेरणा भी ली होगी। यदि एक भी युवा स्वामी जी के आदर्शों को जीवन में सार्थक करता है तो यह हमारी एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
हम सब जानते हैं और गवाह इस क्षण के हैं। इस महान प्रयास के फलस्वरूप न जाने सम्भावनाओं के कितने आकाश खुले हैं, कितना दृष्टिकोण सशक्त होगा। कितनी प्रेरणाओं ने जन्म लिया है। अध्यापकों का चेहरा्रीट से दमक रहा होगा इस भावना से कि एक समर्थ पीढ़ी पीढ़ी राष्ट्र को समर्पित करने की सम्भावना अंगड़ाई ले रही है और हम सब जो इस दृश्य का गवाह बन गए हैं, एक आत्मविश्वास व आत्म संतुष्टि का अंकुर पनपा यह देख कर हमारे युवा वर्ग ने कठिन परिश्रम किया इस प्रतियोगिता को प्रदेष भर में आयोजित करवा कर स्वामी जी के जन्मदिन पर राज्य स्तरीय पारितोशिक वितरण विभिन्न स्तर पर सफलतापूर्वक आयोजित कर सबको निःशब्द कर दिया। 104 विजेताओं को लगभग 12 लाख की राशि कायाकल्प ट्रस्ट द्वारा पढ़े गए जो स्वयं में एक अनोखी अनुकरणीय उदाहरण है।
स्वामी जी फिर से एक बार हमारे सामने जीवन्त हो गए और वह सदैव जीवित रहेंगे हर भारतीय के दिल व आत्मा में। शिकागो में 11 सितंबर 1893 को उनके द्वारा कहे गए 473 शब्द शिकागो में आई इनस्टीट्यूट की सीढ़ियों पर अभी भी खुद की रोशनी चहुँ बिखेर रही हैं। गर्व होने लगा है सभी को अपनी युवा शक्ति पर जो इस नव-निर्माण को अपनी सशक्त समर्थता से एक छत के नीचे उपस्थित था और वह फौलादी छत थी दृढ़ इच्छा शक्ति के धनी युग पुरुष श्री शान्ता कुमार जी की। माननीय ओजस्वी मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश श्री जय राम ठाकुर जी,
आज ये पंक्तियाँ आदरणीय श्री शान्ता कुमार जी के प्रेरणामयी जीवन पर पूर्णतया चरितार्थ होती हैं: –
” कामयाबी के सफर में धूप बड़े काम में,
छौ अगर होती तो कब के सो गए होते हैं। ”
 जय भारत।

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