मेरा एक छोटा सा मोहल्ला था

 बहुत खूबसूरत कविता

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 बहुत खूबसूरत कविता

मेरा एक छोटा सा मोहल्ला था

By : Mr. Narender Singh Pathania,

Assam
मेरा एक छोटा सा मोहल्ला था
जुड़ी-जुड़ी थी छते सभी की
आंगन सारे लगे हुए थे
गलियां सकरी थी
पर दहलीज बड़ी थी।
यादों के उन गलियारों में
मन कभी-कभी यूँही तफरी कर आता है।
मेरा एक छोटा सा मोहल्ला था
हर घर की एक खास निशानी थी
अजब-गजब थे पते सभी के
“201/46 , तीन इमली के चौराहे पर , टेढ़े खम्बे की सीध में, चाय की टपरी छोड़कर , पुराने मंदिर के बाजू से , पक्के कुँए के पीछे”
अब होते नही है ऐसे पते
अब कोई कहाँ ये कहता है
पूछ लेना अगले नुक्कड़ पर
बतला देगा कोई भी ।
अब नही अति उत्साहित लोग
जो पता पूछने पर
घर तक छोड़ आते थे
मोहल्ला धर्म निभाते थे
ताँक-झाँकियाँ गूगल मैप की बड़-बड़ में,
खामोश हो गए है कुछ रिश्ते
मेरा एक छोटा सा मोहल्ला था।
कुछ रिश्ते उस दौर के
एक्सटिंक्ट(extinct) हो गए है
मोहल्ला जिनसे बनता था
वो परिवार श्रिंक(shrink)हो गए है
मुझे याद है कुछ दोस्त
दबे पावँ पीछे से आकर
आंखे मीच दिया करते थे
कलाईयाँ टटोलकर मैं भी उन्हें पहचान लिया करता था
गली के कुछ पुराने लड़के
जवां हुए थे नए-नए
बालों में कंघा घुमा-घुमा कर कनखियों से लड़कियों को निहारा करते थे
नजर मिल जाये कभी तो
झेप जाया करते थे
भले से थे
वो भोले से रिश्ते
मेरा एक छोटा सा मोहल्ला था।
कंबाइन फैमिली की आड़ में
जमकर गपशप मस्ती होती
आधी रात में बासी पूरी संग
गर्म चाय की चुस्की होती
इस दीदी से उस भैया के
नैन-मटक्का के किस्से
चक्कर-वक्कर , अफ़ेयर , लफड़े
फ़ेवरेट सबके सब्जेक्ट होते
मिर्च-मसाले लगा-लगाकर
चटकारे लेकर सुनाए जाते
गली के लैला-मजनुओं के
जोड़े फिर बनाये जाते
परंतु चुगलखोरों की
ग्रुप में एंट्री बन्द रहती
खड़ूस, जलन कुक्डो की
मगर आत्मा बैचैन रहती
जब पीपल की डालियाँ हवा से
सरसराती थी
भूतों के किस्सों वाली
पिटारी खुल जाती थी
बिजली गुल हो जाये गर
घिघि सी बंद जाती थी
फिर रात बातों-बातों में
आंखों-आंखों में कट जाती थी
मेरा छोटा सा एक मोहल्ला था।

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