क्या राज्यपाल अब तो मंजूर करेंगे विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक? राजभवन की कार्यशैली पर उठे सवाल, हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले की हो रही सराहना, भारत के इतिहास में पहली बार राजभवन की छवि हुई दाग़दारपर दाग!







संपादकीय
राजेश सूर्यवंशी,
एडिटर-इन-चीफ
हिमाचल प्रदेश में कुलपति नियुक्ति को लेकर राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव एक बार फिर से सुर्खियों में है।
हाल ही में हिमाचल उच्च न्यायालय के फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्यपाल द्वारा बनाई गई चयन समिति कानूनी रूप से वैध नहीं थी। इसी अवैध समिति ने कुलपति के लिए शैक्षणिक योग्यताएं और अनुभव तय किए थे, जिससे यह आभास हुआ कि यह प्रक्रिया किसी व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए अपनाई गई थी।
न्यायालय का बड़ा फैसला: राज्यपाल की समिति अवैध
हाईकोर्ट ने न केवल चयन समिति की वैधता पर प्रश्नचिन्ह लगाया बल्कि इसके द्वारा किए गए समस्त कार्यों को भी रद्द कर दिया, जिसमें शैक्षणिक योग्यताओं की निर्धारण प्रक्रिया और आवेदन पत्रों की छंटनी शामिल थी। यह फैसला राज्यपाल महोदय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाता है और यह संकेत देता है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में कुलपतियों की नियुक्ति पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए।
विधानसभा का पारदर्शिता की ओर कदम
हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए एक विधेयक पारित किया है। इस विधेयक में निष्पक्ष और पारदर्शी चयन समिति के गठन का प्रावधान है, जो कुलपति के चयन में पूरी तरह से पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा। इस विधेयक का उद्देश्य यह है कि भविष्य में कोई भी नियुक्ति प्रक्रिया संदेह के घेरे में न आए और उच्च शिक्षण संस्थानों की गरिमा बनी रहे।
राज्यपाल की भूमिका पर सवाल
इस विधेयक के पारित होने के बावजूद राज्यपाल की ओर से इसे मंजूरी न दिए जाने से सवाल खड़े हो रहे हैं।
संशय बरकरार…
राज्यपाल की ओर से इस विधेयक को लंबित रखना कहीं न कहीं कुलपति नियुक्ति में पारदर्शिता को बाधित करने जैसा प्रतीत होता है।
यदि राज्यपाल इस विधेयक को दूसरी बार भी मंजूरी नहीं देते हैं, तो कुलपति की नियुक्ति प्रक्रिया फिर से माननीय अदालत के दरवाजे पर जा सकती है।
राज्यपाल की निरंतर देरी से यह संदेह उत्पन्न होता है कि वे सरकार के प्रयासों को विफल करने की कोशिश कर रहे हैं। एक संवैधानिक पद पर रहते हुए भी राज्यपाल का इस तरह से विधायी प्रक्रिया को अवरुद्ध करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
यह यूनिवर्सिटी अमेंडमेंट बिल विधानसभा द्वारा पारित किया गया है, ना कि हिमाचल सरकार द्वारा। अगर राज्यपाल इस बार फिर से इस बिल को पास नहीं करते हैं तो साफ पता चलता है कि वह अभी भी किसी अपने व्यक्ति को वाइस चांसलर लगाने की कोशिश में हैं। यह गवर्नर के लिए बहुत गलत बात है और ऐसा हिंदुस्तान के इतिहास में पहली बार होने जा रहा है जब किसी गवर्नर के खिलाफ माननीय हाईकोर्ट ने इतना खतरनाक फैसला दिया है जिससे राजभवन की इज्जत मिट्टी में मिल गई है। गवर्नर को अपनी मनमानी नहीं करनी चाहिए तथा प्रदेश सरकार को ही उसकी इच्छा से कुलपति नियुक्त करने देना चाहिए। विधानसभा द्वारा सर्वसम्मति से बहुमत से विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक पास किया गया है, जो कि प्रजातंत्र की सबसे बड़ी अदालत है और गवर्नर को इस अदालत का और इसके आदेशों का सम्मान करना चाहिए।
शिक्षा की स्वायत्तता की रक्षा आवश्यक
हिमाचल विधानसभा ने साफ कर दिया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता और पारदर्शिता बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है। राज्यपाल को चाहिए कि वह सरकार के इस विधेयक को तुरंत मंजूरी दें ताकि भविष्य में कुलपति की नियुक्ति बिना किसी विवाद के निष्पक्ष तरीके से हो सके और न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता न पड़े।
लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का प्रश्न
यह मामला केवल एक कुलपति की नियुक्ति का नहीं, बल्कि राज्य में लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और पारदर्शिता की रक्षा का भी है। अब समय आ गया है कि राज्यपाल विधानसभा द्वारा पारित विधेयक को स्वीकृति दें ताकि शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बना रहे और राजनीतिक हस्तक्षेप पर पूर्ण विराम लग सके।
राज्यपाल की निष्क्रियता न केवल शिक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि यह जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का भी हनन है। यदि जल्द ही इस मामले का समाधान नहीं निकला तो उच्च शिक्षण संस्थानों में अव्यवस्था और अनिश्चितता का माहौल बना रहेगा।



